फ़ारूख़ कैसर - वो जब याद आए, बहुत याद आए (रफ़ी, लता)

गीतकार : फ़ारूख़ कैसरराग : कल्याण
चित्रपट : पारसमणी (१९६३)संगीतकार : लक्ष्मीकांत प्यारेलाल
भाव : विरह गायन : मोहम्मद रफ़ी, लता मङ्केश्कर
वो जब याद आये, बहुत याद आये।
गम-ए-ज़िन्दगी के अंधेरे में हमने,
चिराग-ए-मुहब्बत के जलाये बुझाये॥स्थायी॥

वो जब याद आये, बहुत याद आये।

आहटे जाग उठीं, रास्ते हँस दिये,
थाम कर दिल उठे, हम किसी के लिये।
कई बार ऐसा भी धोखा हुआ है,
चले आ रहे हैं वो नजरें झुकाये॥१॥

वो जब याद आये, बहुत याद आये।

दिल सुलगने लगा, अश्क बहने लगे,
जाने क्या-क्या हमें लोग कहने लगे।
मगर रोते-रोते हँसी आ गयी है,
ख़्यालों में आके वो जब मुस्कुराये॥२॥

वो जब याद आये, बहुत याद आये।

वो जुदा क्या हुये, जिन्दगी खो गयी,
शम्मा जलती रही, रोशनी खो गयी।
बहुत कोशिशें कीं मगर दिल ना बहला,
कई साज छेड़े, कई गीत गाये।

वो जब याद आये, बहुत याद आये।
गम-ए-ज़िन्दगी के अंधेरे में हमने,
चिराग-ए-मुहब्बत के जलाये बुझाये।

वो जब याद आये, बहुत याद आये।




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