कैफ़ भोपाली - चलो दिलदार चलो, चाँद के पार चलो, हम हैं तैयार चलो (रफ़ी, लता)

गीतकार : कैफ़ भोपालीराग : पहाड़ी
चित्रपट : पाकीजा (१९७२)संगीतकार : ग़ुलाम मोहम्मद
भाव : प्रमादगायन : मोहम्मद रफ़ी, लता मङ्केश्कर
चलो दिलदार चलो, चाँद के पार चलो।
हम हैं तैयार चलो॥स्थायी॥

चलो दिलदार चलो, चाँद के पार चलो।
हम हैं तैयार चलो।

आओ खो जायें सितारों में कहीं,
आओ खो जायें सितारों में कहीं,
छोड़ दें आज ये दुनिया ये ज़मीं,
दुनिया ये ज़मीं॥१॥

चलो दिलदार चलो, चाँद के पार चलो।
हम हैं तैयार चलो।

हम नशे में हैं सम्भालो हमें तुम,
हम नशे में हैं सम्भालो हमें तुम,
नींद आती है जगा लो हमें तुम,
जगा लो हमें तुम॥२॥

चलो दिलदार चलो, चाँद के पार चलो।
हम हैं तैयार चलो।

ओऽ
ओऽ

ज़िन्दगी ख़तम भी हो जाये अगर,
ज़िन्दगी ख़तम भी हो जाये अगर,
ना कभी ख़त्म हो उल्फ़त का सफ़र,
उल्फ़त का सफ़र॥३॥

चलो दिलदार चलो, चाँद के पार चलो।
हम हैं तैयार चलो।

चलो दिलदार चलो, चाँद के पार चलो।
हम हैं तैयार चलो।

चलो दिलदार चलो, चाँद के पार चलो।
हम हैं तैयार चलो।

आनंद बक्शी - चंदा को ढ़ूँढ़ने सभी तारे निकल पड़े (आशा, हेमलता, उशा)

गीतकार : आनंद बक्शीराग :
चित्रपट : जीने की राह (१९६९)संगीतकार : लक्ष्मीकांत प्यारेलाल
भाव : आसगायन : आशा भोंसले, हेमलता, उशा मङ्केश्कर
चंदा को ढ़ूँढ़ने सभी,
तारे निकल पड़े,
चंदा को ढ़ूँढ़ने सभी,
तारे निकल पड़े,

गलियों में वो नसीब के,
मारे निकल पड़े॥स्थायी॥

चंदा को ढ़ूँढ़ने सभी,
तारे निकल पड़े।

उनकी नजर का जिसने,
नजारा चुरा लिया,
उनके दिलों का जिसने,
सहारा चुरा लिया।

उस चोर की तलाश में,
सारे निकल पड़े॥१॥

चंदा को ढ़ूँढ़ने सभी,
तारे निकल पड़े।

ग़म की अँधेरी रात में,
जलना पड़ा उन्हें,
फूलों के बदले कांटों पे,
चलना पड़ा उन्हें।

धरती पे जब गगन के,
दुलारे निकाल पड़े॥२॥

चंदा को ढ़ूँढ़ने सभी,
तारे निकल पड़े।

उनकी पुकार सुनके,
ये दिल डगमगा गया,
हमको भी कोई बिछड़ा,
हुआ याद गया।

भर आयी आँख, आँसू
हमारे निकल पड़े।

चंदा को ढ़ूँढ़ने सभी,
तारे निकल पड़े,
गलियों में जो नसीब के,
मारे निकल पड़े।

चंदा को ढ़ूँढ़ने सभी,
तारे निकल पड़े।

इंदिवर - चन्दन-सा बदन चञ्चल चितवन, धीरे-से तेरा ये मुस्काना (मुकेश)

गीतकार : इंदिवरराग : कल्याण
चित्रपट : सरस्वती चंद्र (१९६८)संगीतकार : कल्याणजी आनंदजी
भाव : रूपवर्णनगायन : मुकेश
चन्दन-सा बदन, चञ्चल चितवन,
धीरे-से तेरा ये मुस्काना,
मुझे दोष ना देना जगवालों,
हो जाऊँ अगर मैं दीवाना॥स्थायी॥

चन्दन-सा बदन, चञ्चल चितवन।

ये काम-कमान भँवे तेरी,
पलकों के किनारे कजरारे।
माथे पर सिंदूरी सूरज,
होठों पर दहकते अंगारे।

साया भी जो तेरा पड़ जाये,
आबाद हो दिल का वीराना॥१॥

चन्दन-सा बदन, चञ्चल चितवन।

तन भी सुंदर, मन भी सुंदर,
तू संदरता की मूरत है।
किसी और को शायद कम होगी,
मुझे तेरी बहुत ज़रूरत है।

पहले भी बहुत मैं तरसा हूँ,
तू और ना मुझको तरसाना॥२॥

चन्दन-सा बदन, चञ्चल चितवन,
धीरे-से तेरा ये मुस्काना,
मुझे दोष ना देना जगवालों,
मुझे दोष ना देना जगवालों,
हो जाऊँ अगर मैं दीवाना॥२॥

चन्दन-सा बदन, चञ्चल चितवन।

रविन्द्र जैन - जब दीप जले आना,जब शाम ढ़ले आना (येसुदास, हेमलता)

गीतकार : रविन्द्र जैनराग : यमन
चित्रपट : चित्चोर (१९७६)संगीतकार : रविन्द्र जैन
भाव : विरहगायन : येसुदास, हेमलता
आऽ

जब दीप जले आना,
जब शाम ढ़ले आना,
जब दीप जले आना,
जब शाम ढ़ले आना।

संकेत मिलन का भूल ना जाना,
मेरा प्यार ना बिसराना।
जब दीप जले आना,
जब शाम ढ़ले आना॥स्थायी॥

मैं पलकन डगर बुहारूँगा,
तेरी राह निहारूँगा,
मैं पलकन डगर बुहारूँगा,
तेरी राह निहारूँगा।

मेरी प्रीत का काजल तुम अपने,
नैनों में मले आना॥१॥

जब दीप जले आना,
जब शाम ढ़ले आना।

जहाँ पहली बार मिले थे हम,
जिस जगह से संग चले थे हम,
जहाँ पहली बार मिले थे हम,
जिस जगह से संग चले थे हम।

नदिया के किनारे आज उसी,
अमवा के तले आना।

नि रे ग, रे ग, म ग रे सा सा नि,
प प म, रे ग, सा नि सा ग प म प,

नित साँझ-सवेरे मिलते हैं,
आऽ नित साँझ-सवेरे मिलते हैं,
उन्हें देख के तारे खिलते हैं।
नित साँझ-सवेरे मिलते हैं,
उन्हें देख के तारे खिलते हैं।

लेते हैं विदा एक-दूजे से,
कहते हैं चले आना॥३॥

जब दीप जले आना,
जब शाम ढ़ले आना।