शैलेन्द्र सिंह - अजीब दास्तां है ये, कहाँ शुरू कहाँ खतम (लता)

गीतकार : शैलेन्द्र सिंहराग :
चित्रपट : दिल अपना और प्रीत पराई (१९६०)संगीतकार : शंकर जयकिशन
भाव : विमूढ़ गायन : लता मङ्गेश्कर

अजीब दास्तां है ये,
कहाँ शुरू कहाँ खत्म,
ये मंजिलें हैं कौन-सी,
ना वो समझ सके ना हम॥स्थायी॥

अजीब दास्तां है ये,
कहाँ शुरू कहाँ खत्म,
ये मंजिलें हैं कौन-सी,
ना वो समझ सके ना हम॥

ये रोशनी के साथ क्यों,
धुआँ उठा चिराग से।
ये रोशनी के साथ क्यों,
धुआँ उठा चिराग से।

ये ख्वाब देखती हूँ मैं,
कि जग पड़ी हूँ ख्वाब से॥१॥

अजीब दास्तां है ये,
कहाँ शुरू कहाँ खत्म,
ये मंजिलें हैं कौन-सी,
ना वो समझ सके ना हम॥

मुबारक-ए-तुम्हें कि तुम,
किसी के नूर हो गए।
मुबारक-ए-तुम्हें कि तुम,
किसी के नूर हो गए।

किसी के इतने पास हो,
कि सब से दूर हो गए॥२॥

अजीब दास्तां है ये,
कहाँ शुरू कहाँ खत्म,
ये मंजिलें हैं कौन-सी,
ना वो समझ सके ना हम॥

किसी का प्यार लेके तुम,
नया जहाँ बसाओगे।
किसी का प्यार लेके तुम,
नया जहाँ बसाओगे।

ये शाम जब भी आयेगी,
तुम हमको याद आओगे॥३॥

अजीब दास्तां है ये,
कहाँ शुरू कहाँ खत्म,
ये मंजिलें हैं कौन-सी,
ना वो समझ सके ना हम॥





मेरे अन्य पसंदीदा गीत - भारतीय संगीत @ YouTube





गिटार कौर्ड्स

स्थायी:
(C)अजीब दास्ताँ है (Am)ये,
(C)कहाँ शुरू कहाँ (G)खत्म,
(Am)ये मंजिलें हैं कौन-(Dm)सी,
(C)ना वो समझ सके ना (F)हम(C)।

अन्तरा:
(F)ये रोशनी के साथ (Bbm)क्यों,
(C)धुआँ उठा चिराग से,
(Em)ये ख्वाब देखती हूँ (Bbm)मैं,
(C)कि जग पड़ी हूँ ख्वाब (F)से(C)।

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें