शैलेन्द्र - चाहे कोई मुझे जंगली कहे, कहने दो जी कहता रहे (रफ़ी)


गीतकार : शैलेन्द्रराग :
चित्रपट : जंगली (१९६१) संगीतकार : शंकर जयकिशन
भाव : प्रमाद गायन : मोहम्मद रफ़ी
या हू
या हू

चाहे कोई मुझे जंगली कहे,
कहने दो जी कहता रहे,
हम प्यार के तूफानों में घिरे हैं,
हम क्या करें॥स्थायी॥

चाहे कोई मुझे जंगली कहे,
कहने दो जी कहता रहे,
हम प्यार के तूफानों में घिरे हैं,
हम क्या करें।


या हू
या हू


मेरे सीने में भी दिल है,
है मेरे भी कुछ अरमां,
मुझे पत्थर तो ना समझो,
मैं हूँ आखिर एक ईंसान।

है मेरी वही, जिसपे दुनिया चली,
है मेरी वही, जिसपे दुनिया चली॥१॥

चाहे कोई मुझे जंगली कहे,
कहने दो जी कहता रहे,
हम प्यार के तूफानों में घिरे हैं,
हम क्या करें।


चाहे कोई मुझे जंगली कहे।

या हू
या हू


सर्द आहें कह रही हैं,
है ये कैसी बला की आग,
सोते-सोते जिन्दगानी,
घबरा के उठी है जाग।


मैं यहाँ से वहाँ, जैसे ये आसमां,
मैं यहाँ से वहाँ, जैसे ये आसमां॥२॥

चाहे कोई मुझे जंगली कहे,
कहने दो जी कहता रहे,
हम प्यार के तूफानों में घिरे हैं,
हम क्या करें।


चाहे कोई मुझे जंगली कहे,
कहने दो जी कहता रहे,
हम प्यार के तूफानों में घिरे हैं,
हम क्या करें।


चाहे कोई मुझे जंगली कहे।



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