मजरूह सुल्तानपुरी - पुकारता चला हूँ मैं, गली-गली बहार की (रफ़ी)


गीतकार : मजरूह सुल्तानपुरीराग :
चित्रपट : मेरे सनम (१९६५) संगीतकार : ओ पी नैय्यर
भाव : आस गायन : मोहम्मद रफ़ी
पुकारता चला हूँ मैं,
गली-गली बहार की,
बस एक छाँव जुल्फ की,
बस एक निगाह प्यार की॥स्थायी॥

पुकारता चला हूँ मैं,
गली-गली बहार की,
बस एक छाँव जुल्फ की,
बस एक निगाह प्यार की।

पुकारता चला हूँ मैं।

ये दिल्लगी ये शोखियाँ सलाम की,
यही तो बात हो रही है काम की,
कोई तो मुड़ के देख लेगा इस तरफ,
कोई तो नजर तो होगी मेरे नाम की॥१॥

पुकारता चला हूँ मैं,
गली-गली बहार की,
बस एक छाँव जुल्फ की,
बस एक निगाह प्यार की।


पुकारता चला हूँ मैं।

सुनी मेरी सदा तो किस यकीन से,
घटा उतर के आ गयी जमीन पे,
रही यही लगन तो ऐ दिल-ए-जवां,
असर भी हो रहेगा एक हँसीन पे॥२॥

पुकारता चला हूँ मैं,
गली-गली बहार की,
बस एक छाँव जुल्फ की,
बस एक निगाह प्यार की।


पुकारता चला हूँ मैं।


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