साहिर लुधियान्वी - ये रात ये चाँदनी फिर कहाँ, सुन जा दिल की दास्तां (हेमन्त)

गीतकार : साहिर लुधियान्वीराग :
चित्रपट : जाल (१९५२) संगीतकार : सचिनदेव बर्मन
भाव : प्रेम गायन : हेमन्त कुमार
हाऽ
हा हा हा, हा हा, हा हा, हा हा

ये रात ये चाँदनी फिर कहाँ,
सुन जा दिल की दास्तां।
ये रात ये चाँदनी फिर कहाँ,
सुन जा दिल की दास्तां॥स्थायी॥

हममऽ, हममऽ

हेऽ पेड़ों की शाखों पे,
पेड़ों की शाखों पे सोई-सोई चाँदनी,
पेड़ों की शाखों पे।
तेरे ख्यालों में खोई-खोई चाँदनी।

और थोड़ी देर में थक के लौट जायेगी,
रात ये बहार की फिर ना आयेगी,
दो एक पल और है ये समाँ,
सुन जा दिल की दास्तां॥१॥

हममऽ, हममऽ
ओऽ लहरों के होठों पे,
लहरों के होठों पे धीमा-धीमा राग है,
लहरों के होठों पे।
भीगी हवाओं में ठंडी-ठंडी आग है।

इस हँसीन आग में तू भी जल के देख ले,
जिन्दगी के गीत की धुन बदल के देख ले,
खुलने दे अब धड़कनों की जबां,
सुन जा दिल की दास्तां॥२॥

हेऽ जाती बहारें हैं,
जाती बहारें हैं, उठती जवानियाँ,
जाती बहारें हैं।
तारों की छावों में पहनें कहानियाँ।

एक बार चल दिये गर तुझे पुकार के,
लौट कर ना आएँगे काफिले बहार के।
एक बार चल दिये गर तुझे पुकार के,

लौट कर ना आएँगे काफिले बहार के।
आ जा अभी जिन्दगी है जवां,
सुन जा दिल की दास्तां॥३॥

ये रात ये चाँदनी फिर कहाँ,
सुन जा दिल की दास्तां।

दास्तां, दास्तां।



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