जावेद अख्तर - कुछ ना कहो, कुछ भी ना कहो, क्या कहना है, क्या सुनना है (कुमार सानू)


गीतकार : जावेद अख्तरराग :
चित्रपट : १९४२ लव स्टोरी (१९९४) संगीतकार : राहुलदेव बर्मन
भाव : प्रेम गायन : कुमार सानू
कुछ ना कहो, कुछ भी ना कहो,
कुछ ना कहो, कुछ भी ना कहो।

क्या कहना है, क्या सुनना है,
मुझको पता है, तुमको पता है,
समय का ये पल, थम-सा गया है,
और इस पल में, कोई नहीं है,
बस एक मैं हूँ, बस एक तुम हो॥स्थायी॥

कुछ ना कहो, कुछ भी ना कहो।

कितने गहरे हल्के, शाम के रंग हैं छलके,
परबत से यूँ, उतरे बादल, जैसे आँचल ढ़ल के।
कितने गहरे हल्के, शाम के रंग हैं छलके,
परबत से यूँ, उतरे बादल, जैसे आँचल ढ़ल के॥१॥


और इस पल में, कोई नहीं है,
बस एक मैं हूँ, बस एक तुम हो।

कुछ ना कहो, कुछ भी ना कहो।

सुलगी-सुलगी साँसें, बहकी-बहकी धड़कन,
महके-महके शाम के साये, पिघले-पिघले तन-मन।
सुलगी-सुलगी साँसें, बहकी-बहकी धड़कन,
महके-महके शाम के साये, पिघले-पिघले तन-मन॥२॥


और इस पल में, कोई नहीं है,
बस एक मैं हूँ, बस एक तुम हो।


कुछ ना कहो, कुछ भी ना कहो।

क्या कहना है, क्या सुनना है,
मुझको पता है, तुमको पता है,
समय का ये पल, थम-सा गया है,
और इस पल में, कोई नहीं है,
बस एक मैं हूँ, बस एक तुम हो।


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